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यह पाण्डुलिपियां हिमालय क्षेत्र में उगने वाले भूर्ज नामक पेड़ कि छाल से विशेष तरीके से तैयार किया जाता था। भूर्ज पेड़ कि छाल सफेद रंग के होते थे। इसे आवश्यकतानुसार आकार में काटकर उस पर स्याही से लिखा जाता है। प्राचीन काल में विभिन्न प्रकार के स्याही का इस्तेमाल होता था। लेकिन मुख्य रूप से काले स्याही का इस्तेमाल ज्यादा होता था। काले स्याही को संस्कृत में ' मसि ' कहा जाता है।
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| ऋगवेद पाण्डुलिपि |
पाण्डुलिपि ज्यादातर संस्कृत भाषा में लिखी हुई मिलती है। लेकिन यह तामिल, उड़िया और कई प्रकार के प्राकृत भाषाओं में भी उपलब्ध है। कई पाण्डुलिपि देवनागरी लिपियों में लिखी मिलती है। देवनागरी एक ब्राह्मी लिपि है। इसकी विशेषता यह है कि ये बायें से दायें ओर लिखी जाती है।
पाण्डुलिपि ताड़पत्र पर भी लिखी हुई मिलती है। ताड़ वृक्ष कि सूखी पत्तों को इस उपयोग में लाया गया था। ताड़पत्र लौह लेखनी से लिखे जाते हैं। ताड़पत्र का उपयोग एशिया के कुछ भागों में १५ वीं सदी ईसा पूर्व तक मिलता हैं। पाण्डुलिपि ज्यादातर मंदिरों और विहारों में प्राप्त होता है। इसीलिए पाण्डुलिपियों के इतिहास ही भारतीय परम्परा का हतिहास माना जाता है।
श्री मद्भागवत गीता भारतीय सभ्यता कि धरोहर और हिन्दु धर्म की पवित्र ग्रंथ एक हजार साल पहले मिली पाण्डुलिपि का ही संस्करण है। बक्षाली पाण्डुलिपि प्राचीन भारत की गणित से सम्बंधित पाण्डुलिपि है जिसे सन् १८८१ में बक्षाली गांव ( वर्तमान पाकिस्तान में), तक्षशिला से लगभग ७० किमी दूर में मिली थी। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कि सरस्वती पुस्तकालय में एक लाख दुर्लभ पांडुलिपियों का भण्डार है। चेन्नई में सरकारी ओरिएंटल पाण्डुलिपि पुस्तकालय में अलग अलग जगहों से मिली ७० हजार से अधिक पाण्डुलिपियां संरक्षित करके रखीं हुईं हैं।
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