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ब्रम्हदेश में बौद्ध धर्म का प्रसार
सम्राट अशोक की कार्यकाल में बौद्ध धर्म की प्रसार हेतु दो दुत उत्तर एवं सोण धम्मदुत के रूप में ब्रम्हदेश पहूंची। बर्मीज परम्परा के अनुसार उस समय बर्मा के लोगों में एक विपदा आ पड़ी थी। बर्मा के राजमहल में जन्म लेने वाले कुमार को एक राक्षसी आकर खा जाती थी। संयोगवश जिस दिन बौद्ध धर्मदुत बर्मा पहुंचे उसी दिन राजमहल में एक बालक का जन्म हुआ। जब राक्षसी बालक को खाने पहुंचे तब धर्मदुत ने बर्मा के लोगों को इस विपत्ति से बाहर निकालने के लिए राक्षसी से युद्ध किया। राक्षसी को धर्मदुत के हाथों प्ररास्त होना पड़ा और वो यह चोंच के चले गए की ब्रह्मदेश अवसे धर्मदुत के अधीन है। बर्मा के लोगों ने बौद्ध धर्मदुतों को बहुत सम्मान आदर दिया। तत्पश्चात बौद्ध भीक्षूओ ने बर्मा के लोगों को इकट्ठा करके ब्रह्मजाल सूत्र का उपदेश दिया । बौद्ध भिक्षुओं के उपदेश में बहुत सारे लोगों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। बर्मा के हजारों कुमार कुमारीयों ने धर्मदुतों से प्रवज्जा ग्रहण किया। ओर यही से ब्रह्मदेश पर बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। वर्तमान समय में म्यांमार जनसंख्या में भिक्षूओं के अनुपात और धर्म पर खर्च की गई आय के अनुपात से दुनिया के सबसे अधिक धार्मिक बौद्ध देश हैं। म्यांमार के राजधानी यांगोन में स्थित श्वेडागोन पैगोडा सोने कि ८,८६८ महीन पत्तीयों से ढका ९९ मिटर ऊंचा बर्मा का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र पैगोडा माना जाता है। कहा जाता है कि वहां पर गौतम वुद्ध के ८ बाल संभाल के रखे हैं।
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