अरनमुला कन्नड़ी दुनिया का सबसे कीमती हस्तनिर्मित धातु दर्पण

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  अरनमुला कन्नड़ी दुनिया का सबसे कीमती हस्तनिर्मित धातु दर्पण मानस दर्पण देख, दोष-गुण स्वयं निहारें। अपने को पहचान, आप ही आप सुधारें।। अवधेश कुमार "अवध" दर्पण का इतिहास काफ़ी पुराना है।दर्पण पारंपरिक रूप से कांच का उपयोग करके बनाए जाते हैं, लेकिन वे कांच से भी लंबे समय से मौजूद हैं। पहले साधारण दर्पण लगभग 600 ईसा पूर्व पॉलिश किए गए ओब्सीडियन से बनाए गए थे। मेसोपोटामिया और मिस्र में 4000 से 3000 ईसा पूर्व के आस-पास तांबे को पॉलिश करके शीशे बनाए गए थे। विरूपण मुक्त छवियाँ बनाने के लिए धातु के दर्पण बनाने की कला पुरानी दुनिया के विभिन्न भागों में लंबे समय से प्रचलित है। 1400 ईसा पूर्व तक, टिन में 30 वज़न प्रतिशत तक युक्त कांस्य का उपयोग दर्पण बनाने के लिए किया जाता था।हमारे भारत में भी तांबे-टिन कांस्य को ढालकर और पॉलिश करके धातु के दर्पण बनाने की कला को अच्छी तरह से समझा जाता था और ये दर्पण अपनी स्पष्टता के लिए बहुत लोकप्रिय थे।ऋग्वेद सहित कई पुराणों में धातु के दर्पण का उल्लेख किया गया है। यहां तक ​​कि कजुराहो की नक्काशी...

विश्व का सबसे बड़ा कहवा पात्र साओ पाउलो ब्राजील

 विश्व का सबसे बड़ा कहवा पात्र साओ पाउलो ब्राजील 


                                                         



 कहवा या कॉफी एक लोकप्रिय पेय पदार्थ है जो काॅफी के पेड़ के भुने हुए बीजों से बनाया जाता है। इसमें कैफीन होता है जीस बजह से ये हल्के उद्दीपक सा प्रभाव डालती है। इसकी तीन मुख्य किस्में है- कॅफिया लाइबेरिया, काॅफिया अरेबिका, और काॅफिया रोबस्टा। 



काॅफी के उत्पत्ति का केंद्र इथियोपिया को माना जाता है। काॅफी के इतिहास को लेकर एक कहानी प्रचलित है जिसके अनुसार एक बकरी चराने वाले व्यक्ति कालडी अपने बकरीयों को देखा कि वे बहुत अजीब हरकते कर रहे हैं। कालडी को अच्छी तरह से देखने के बाद यह पता चला कि बकरीया एक पेड़ से जामुन जैसा कुछ खा रहे थे जिसके बाद बकरीया उर्जावान और उत्साहित हो जाते थे। कालडी ने ख़ुद वो जामुन चखा ओर उसे भी बहुत उर्जा महसूस हूआ। उन्होंने वो जामुन एक भीक्षु के पास ले गया। भीक्षु ने इसे सैतान का काम समझके आग में फैक दिया। एसा करने पर उस जामुन से एक सुन्दर, स्वर्गीय खुशब निकलने लगी। एरर्सइसे देखकर भीक्षु ने तुरंत जामुन को आग से निकाल लिया और एक जग में रखकर गर्म पानी से ढक दिया। इसके बाद भीक्षुओ ने इस मिश्रण को पीना शुरू किया और धीरे धीरे उन्हें यह अहसास हुआ कि यह जामुन का मिश्रण उन्हें रात को प्रार्थना और भक्ति के दौरान जागते रहने में मदद की है। तब से यह पेय के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय होते गए। 




काॅफी की लोकप्रियता सिर्फ इथियोपिया में ही सीमाबद्ध न रहा। 15वीं शताब्दी में काॅफी की खुशबू लाल सागर पार यमन तक पहुचीं। इसके बाद अरब के यमनी क्षेत्र में काॅफी को उगाया जाने लगा। 16वीं शताब्दी तक यह मिस्र, तुर्की, फारसी, सीरिया में जाना जाने लगा। 1970 में डोरोथी जोन्स, बोस्टन में काॅफी बेचने का लाइसेंस प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति बने।उष्णकटिबंधीय मौसम काॅफी की खेती के लिए आदर्श देखने को मिली और पुरे मध्य अमेरिका में काफी के बागान तेजी से फैल गया। लेटिन अमेरिका के देशों में भी काॅफी के खेती के लिए पर्याप्त स्थितियां मौजूद थी जीसके फलस्वरूप 18वीं शताब्दी के मध्य तक लेटिन अमेरिका देश शीर्ष काॅफी उत्पादकों में से एक बन गए। 



वर्तमान समय में ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा काॅफी उत्पादक देश है। ब्राजील दुनिया की लगभग एक तिहाई काॅफी का उत्पादन करते हैं, जिससे ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा काॅफी निर्यातक बन गए। ब्राजील के साओ पाउलो राज्य में सबसे ज्यादा काफी के बागान मिलते हैं। साओ पाउलो की अल्टा मोगियाना क्षेत्र में सबसे अच्छे काॅफी उत्पादन किया जाता है। दरअसल ब्राजील के साओ पाउलो राज्य की उचाई अधिक होने के कारण और धुप, बारिश का अच्छा संतुलन इस क्षेत्र को काॅफी के खेती के लिए उत्कृष्ट बनाते हैं। 







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