समान नागरिक संहिता(uniform civil code) और इसकी आवश्यकता
समान नागरिक संहिता अर्थात एक देश, एक कानून। समान नागरिक संहिता हर धर्म, जाती और लिंग के लिए एक कानून की व्यवस्था है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। एक लोकतांत्रिक देश में धर्म निरपेक्षता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के संविधान धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों में स्थान दिया है। भारत में धर्म के आधार पर व्यक्तिगत कानून विवाह, तलाक, विरासत, गुजारा भत्ता जैसे मामलों पर अलग अलग होते हैं।
भारत में सम्राट अशोक के समय से ही धार्मिक स्वतंत्रता स्वीकार था। 12 वीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन के साथ अतरंधार्मिक संबधों के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। इस्लाम के राजनीतिक सिद्धांत हिन्दू धर्म, इसाई धर्म ओर अन्य भारतीय धर्मों के सिद्धांत के विपरीत था। उस समय के दौरान भारत में इस्लाम धर्म की प्राथमिकता थी। बाद में भारत में ईस्ट इन्डिया कम्पनी ओर ब्रिटिश राज ने धर्मों के प्रति तटस्थता की नीति अपनाया। अंग्रेज़ों ने भारत के देशी धर्मों का समर्थन और संरक्षण देने की नीति का पालन किया। 19 वीं शताब्दी के मध्य तक ब्रिटिश सरकार ने भारत में विवाह, सम्पत्ति के विरासत और तलाक संबंधित मामलों में, प्रत्येक भारतीय धर्म के आधार पर व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार, इस्लामी न्यायविदों, हिन्दू पंडितों और संबंधित धार्मिक दस्तावेजों के व्याख्या के अनुसार शासन किया। बाद में ब्रिटिश सरकार ने यह परिलक्षित किया कि इस्लामिक न्यायविदों और हिन्दू पंडितों के धार्मिक व्याख्या अलग अलग है । विद्वान और न्यायविद एक दूसरे से असहमत थे जिसके फलस्वरूप न्याय की प्रक्रिया असंगत और संदिग्ध रुप से भ्रष्ट हो गया था। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश सरकार द्वारा इस्लाम धर्म और हिन्दू धर्म के धार्मिक मतभेदों को विभाजित करने के लिए एंग्लो-हिन्दू और एंग्लो-मुसलिम व्यक्तिगत कानून की व्यवस्था की गई और भारत के लोगों को व्यक्तिगत धर्म के आधार पर अलग करके अपना शासन जारी रखा। 20 वीं सदी में ब्रिटिश सरकार को हिंदू गाधीं और मुस्लिम जिन्ना के नेतृत्व वाली अलग अलग समूहों द्वारा स्व-शासन के लिए बढ़ती सामाजिक सक्रियता का सामना करना पड़ा जिसके उपरांत ब्रिटिश सरकार ने भारत स्वाधीन से पहले 1947 में कई कानून लागू किया जिसके अंतर्गत भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट 1937 भी आता है।
भारत के आजादी के बाद सन् 1985 में शाहबानो नाम की एक मुस्लिम महिला के साथ घटि घटना ने ब्रिटिश सरकार के व्यक्तिगत कानून व्यवस्था के उपर बहुत बड़ा सवाल उठाया। दरअसल शाहबानो का निकाह छोटी उम्र में ही हो गया था। उसकी 5 बच्चे थे। 14 साल के निकाह के बाद उसके पती ने दुसरी सादी कर ली थी। शाहबानो ओर पती के बीच झगड़ा हुआ और दोनों ने समझोते के साथ अलग होने का फैसला किया। समझोते के तहत शाहबानो को उसके पती ने 200 रूपये गुजारा भत्ता देने के लिए राजी हो गया था। लेकिन बाद में वो मुकर गया। शाहबानो इन्दोर के अदालत जा पहुचीं। अदालत में उसके पती ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के हवाला देते हुए कहा कि वो गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है। बाद में शाहबानो ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया। तब उसके पती ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही करार दिया। उसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पहलीबार यह टिप्पणी देकर कहा की भारत में एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है।
भारतीय संविधान में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में समान नागरिक संहिता का प्रावधान है। हमारे संविधान के 44 अनुच्छेद में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि राज्य भारत के पुरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा। समान नागरिक संहिता पुरे देश के लिए एक समान कानून के साथ ही सभी धार्मिक समुदायों के लिए विवाह, तलाक़, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एकरूपता प्रदान करने की प्रावधान करती है।
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