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खालिस्तान आंन्दोलन का इतिहास
खालिस्तान जिसका अर्थ है खालसा की सरजमीं, जहाँ सिर्फ सिख रहते हो। भारत में सिख समुदाय के द्वारा अपने लिए एक अलग स्वतंत्र राज्य की मांग करते हुए यह खालिस्तान शब्द का इस्तेमाल किया था।खालिस्तान मांग की शुरुआत सन् 1929 में हूआ था जब मोतिलाल नेहरू जी ने "पूर्ण स्वराज" आन्दोलन शुरू किया। मोतिलाल नेहरू ने जब यह कहा कि भारत एक स्वतंत्र देश बनेगा जहा पर गणतंत्र रहेगा। सिख समुदाय के लोगों को यह उम्मीद थी कि जब भारत स्वतंत्र होने के बाद अंग्रेजी लोग भारत से चले जायेंगे तो उन्हें अपनी सिख साम्राज्य वापस मिल जायेगी जहाँ पर अंग्रेजों ने कब्जा करके रखा था।लेकिन जब 1946 में अंग्रेजों ने भारत छोड़ने से पहले जनसंख्या के आधार पर भारत का बटवारा करके पंजाब का आधे से ज्यादा हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया, जहाँ पर मुस्लिम लोगों की आवादी थी, तब सिख समुदाय की शिरोमणि अकाली दल ने भी अपने लिए सिखीस्तान की मांग की। क्योंकि तब पजांब में सिख समुदाय की आवादी ज्यादा थी।लेकिन यह मांग पुरा नही किया गया।
बाद में,1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत भाषा के आधार पर केन्द्रीय सरकार के द्वारा राज्य का बटवारा किया गया।तब सिख के अकाली दल ने फिर से पंजाब को भाषा के आधार पर पंजाबी राज्य घोषणा करने की मांग की।लेकिन सिखो की यह मांग भी अस्वीकार कीया गया। इस बात से सिख समुदाय बहुत नाराज थे।बाद में अकाली दल के नेता तारा सिंह ने सीखो के उपर हूई भेदभाव के विरुद्ध "पंजाबी सूबा आन्दोलन " की शुरुआत की। इसीबीच जब 1965 में भारत-पाकिस्तान युध्द हुआ तब सीख समुदाय ने अपनी सारी शिकायतें भुलकर पुरी तरह से भारत सरकार की मदद की।इसके बाद भारत सरकार को सिख समुदाय की अहमियत का पता चला और सन् 1966 में सिख समुदाय की मांग पुरा करते हुए पंजाब को एक अलग राज्य की घोषणा की ।
पंजाब में निर्वाचन हुआ ओर अकाली दल की जीत हुई। लेकिन 1972 में अकाली दल को कंग्रेस के सामने हारना पड़ा।1973 में अकाली दल ने अपने एक कमिटी बनाई ओर पंजाब के विभिन्न मुद्दों के उपर अपना मांग रखते हुए, पंजाब को एक स्वायत्त राज्य के रूप में स्वीकार करने के लिए तथा पंजाब मे केन्द्रीय सरकार का दखल कम करने के मांग से आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया।सन् 1982 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को कार्यकरी करने के लिए धर्मयुध्द मोर्चा शुरू की।सिख संगठन दमदमी टक्साल के धार्मिक नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में धर्मयुद्ध मोर्चा तेजी से फैल रही थी। पंजाब में हिन्दू को मार दिया जा रहा था। कंग्रेस के नेताओं के उपर जानलेवा हमला किया जा रहा था,बैंक को लुट लिया जाता था,सरकारी हथियारों को लुट लिया जा रहा था।पंजाब की खराब परिस्थिति को देखकर वहा राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। भिंडरावाले ने खुदको सुरक्षित करने के लिए अपने कामकाज स्वर्णमंदिर के अकाल तख्त से शुरू की।इन्दिरा गान्धी ने परिस्थिति को संभालने के लिए आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को स्वीकार करने की बात की, लेकिन कुछ मुद्दों पर असहमत प्रकाश भी किया।अकाली दल ने सरकार की बात स्वीकार कर लिया। लेकिन भिंडरवाले ने सरकार की प्रस्ताव को अस्वीकार किया।सन् 1984 में भारतीय सेना द्वारा "आपरेशन ब्लू स्टार " के तहत स्वर्णमंदिर में अभियान चलाया गया और भिंडरवाले की हत्या कर दी गई।भिंडरवाले के अतं के साथ ही भारत में खालिस्तान की मांग की भी अंत हो गया।
1 जुन, 2015 में पंजाब के बुर्ज जवाहर सिंह वाले गाँव के गुरुद्वार से गुरु ग्रंथ साहिब की चोरी हुई और ग्रंथ साहिब की पृष्ठों की वेअदवी की गई।इस बात से सिख समुदाय के लोंग फिरसे नाराज हो गयें और जगह जगह पर खालिस्तान की मांग उठाया गया।भारत के बाहर भी सिख समुदाय द्वारा खालिस्तान के लिए आवाज उठाते परिलक्षित हुए।
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