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भारत का धनुष पुरूष भील
प्राचीन काल से ही भारत अनेक जनजातिय समूहों का संगम स्थल रहा है।जनजाति अर्थात किसी एक सामान्य क्षेत्र में निवास करने वाले समूह, जीसकी अपनी एक भाषा और संस्कृति होती है।जनजाति समूह सभ्य समाज से दूर वनों एवं पहाड़ीयों में दुरस्त स्थानों में निवास करते हैं।भील जनजाति भारत के जनजातियों समूहों में से एक है, जो सबसे प्राचीन है।भील जनजाति के लोग भारत के मध्यप्रदेश, गुजरात,छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान में निवास करते हैं।भील जनजाति भारत समेत पाकिस्तान तक विस्तृत रूप से फैली हुई है। प्राचीन समय में भील जनजाति का शासन शिवी जनपद में स्थापित था,जिसे वर्तमान में मेवाड़ कहते है।
भील शब्द की उत्पत्ति "वील" से हुई है जिसका द्रविड़ भाषा में अर्थ होता हैं "धनुष"।भील जनजाति को "भारत का धनुष पुरुष " कहा जाता है क्योंकि ये धनुष विद्या में बहुत माहिर होते हैं।2011 की जनगणना के अनुसार भील भारत का सबसे बड़ा आदिवासी समूह है। वे भारत की कुल अनुसूचित जनजातीय आबादी का लगभग 38% हैं।
प्राचीन काल से ही भील जनजाति के आर्थिक जीवन का आधार कृषि, शिकार, पशुपालन एवं मजदुरी रहा है।भील अधिकांश दुर्गम क्षेत्र में निवास करना अधिक पसंद करते थे।भीलों ने कृषि कार्य के लिए झुम पद्धति का सहारा लेता था, जिसमें जंगलो को काटकर जला दिया जाता था।19 वीं शताब्दी में भीलों ने कृषिकार्य में उन्नत पद्धति को अपनाना आरम्भ कर दिया।प्राचीन समय में भील लोग मुख्यतः खरीफ की फसल बोते थे, क्योंकि कृषि वर्षा पर निर्भर थी,और भील जहाँ पर रहना पसंद करते थे, वहा सिचाई की सुविधा नहीं थी।वर्तमान समय में भील जनजाति के लोग गाँव बनाकर अपनी भुमि में खेती करते दिखाई देता है। वे अपने भोजन की खेती अपनी भूमि में करते हैं और उनका मुख्य भोजन मक्का, प्याज, लहसुन और मिर्च है, जबकि गेहूं और चावल का उपयोग विशेष अवसरों और त्योहारों के लिए किया जाता है।
भील जनजातीय समाज में आज भी लोक नृत्य के महत्व को देखा जाता है।भीलों में प्रचलित नृत्यों में सुर,ताल वं देशी वाद्ययंत्रों का प्रयोग अधिक होता है। प्रायः भीलों में लोक नृत्य का प्रदर्शन वाद्ययंत्र, ढोलक,नगारा, तंम्बुरा,इकतारा और तुरई के साथ किया जाता है।भीलों द्वारा कभी कभी ताली बजाकर, चुटकी या मुख से विचित्र आवाज निकालकर भी नृत्य किया जाता है।गवरी लोकनृत्य भील जनजाति की सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य है।
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