चोल राजवंश का इतिहास
चोल साम्राज्य की स्थापना 300 ईसापूर्व अर्थात आज से लगभग 2300 साल पहले हुआ था। चोल प्राचीन भारत का एक राजवंश था। चोल साम्राज्य का विस्तार दक्षिण भारत में जो बर्तमान के तमिलनाडु, अन्ध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक तक फैला था।इसके अतिरिक्त तमिल चोल शासकों ने दक्षिण भारत और निकटवर्ती अन्य देशों में 9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया था, जिसका विस्तार बांग्लादेश,थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया,सिंगापुर, कम्बोडिया,भियेटनाम तक फैला था। चोलों ने 1500 साल तक शासन किया था।
यूनानी भूगोलवेत्ता टॅलेमी के लेख में भी चोल देश और उसके कस्बों, बंदरगाहों और वाणिज्य के संक्षिप्त संदर्भ है। उन्होंने 130 ईस्वी में 'भारत का भूगोल' लिखा था।चोल साम्राज्य में 20 से अधिक राजाओं ने इतिहास रचा था। इस चोल वंश का संस्थापक विजयालय (850-870-71 ई.) पल्लव अधीनता में उरैयुर प्रदेश का शासक था। विजयालय की वंशपरंपरा में लगभग 20 राजा हुए, जिन्होंने कुल मिलाकर चार सौ से अधिक वर्षों तक शासन किया।राजराज चोल (985-1014 ई.) को सबसे महान चोल शासक माना जाता है। वह दक्षिण भारत के महानतम राजाओं में से एक थे और उन्हें "महान राजराज" के नाम से जाना जाता था।उनके शासन में चोलों ने दक्षिण में श्रीलंका तथा उत्तर में कलिंग तक साम्राज्य फैलाया।राजराज चोल ने कई नौसैन्य अभियान भी चलाये, जिसके फलस्वरूप मालाबार तट, मालदीव तथा श्रीलंका को आधिपत्य में लिया गया।
चोलो के अभिलेखों आदि से ज्ञात होता है कि उनका शासन सुसंगठित था। राज्य का सबसे बड़ा अधिकारी राजा मंत्रियों एवं राज्याधिकारियों की सलाह से शासन करता था। शासनसुविधा की दृष्टि से सारा राज्य अनेक मंडलों में विभक्त था।चोल शासक प्रसिद्ध भवननिर्माता थे। सिंचाई की व्यवस्था, राजमार्गों के निर्माण आदि के अतिरिक्त उन्होंने नगरों एवं विशाल मंदिर बनवाया।
राजराज चोल ने हिंदुओं के विशालतम मंदिरों में से एक, तंजौर के बृहदीश्वर मन्दिर का निर्माण कराया जो वर्तमान समय में यूनेस्को की विश्व धरोहरों में सम्मिलित है। यह प्राचीन भारतीय मंदिरों में सबसे अधिक ऊँचा एवं बड़ा है।राजाराज चोल प्रथम ने 1004 से 1009 ईस्वी सन् के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया था। चोल शासकों ने इस मंदिर को राजराजेश्वर नाम दिया था लेकिन तंजौर पर हमला करने वाले मराठा शासकों ने इस मंदिर का नाम बदलकर बृहदेश्वर कर दिया। यह प्राचीन भारतीय मंदिरों में सबसे अधिक ऊँचा एवं बड़ा है। तंजौर के मंदिर की दीवारों पर अंकित चित्र उल्लेखनीय एवं बड़े महत्वपूर्ण हैं।
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