सेंटिनलीज़ जनजाति
हिंद महासागर में उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर रहने वाले सेंटिनलीज़ लोग एक पाषाण युग की जनजाति हैं।निग्रिटो समुदाय की यह जनजाति अनुमानित 60,000 वर्षों से द्वीप पर निवास कर रहे हैं।वे बाहरी लोगों के साथ सभी संपर्कों को सख्ती से अस्वीकार करते हैं।आदिमानव जीवन शैली से अभ्यस्त यह जनजाति उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर पुरे दुनिया से दूर एकांत में वास करते हैं। ये लोग द्वीप पर जंगली सुअर, मनिटर लिजार्ड की शीकार करते हैं,मछली पकड़ते है,नारियल खाते हैं और द्वीप पर मीले विभिन्न प्रकार की फल और पौधे खाते हैं।
सेंटिनलीज़ जनजाति के बारे में दुनिया ने कई वर्षों तक एक नरभक्षी जनजाति के रूप में गलत धारणा ली हुईं हैं।दुसरी शताब्दी में भूगोलवेत्ता क्लोडिअस टोलमी ने अपने लेख में अंडमान निकोबार के द्वीप समूह को उद्देश्य करके लिखा था कि यह द्वीप नरभक्षीयों का द्वीप है।उन्होंने इसी लेख में अंडमान के कुछ द्वीपों को सोभाग्य का द्वीप भी कहा था।
तेरहवीं शताब्दी के खोजकर्ता मार्को पोलो ने अपनी यात्रा पत्रिकाओं में भारत के सुदूर अंडमान द्वीप समूह की सेंटिनलीज़ जनजाति का वर्णन करते हुए लिखा: "वे सबसे हिंसक और क्रूर पीढ़ी हैं जो हर किसी को पकड़ कर खा जाते हैं।"
1867 में, एक भारतीय व्यापारी जहाज को भीषण मानसून के कारण द्वीप पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे द्वीपवासियों ने तीरों से हमला कर दिया। रॉयल नेवी उनके बचाव में आने तक चालक दल प्राथमिक हथियारों से अपना बचाव करने में कामयाब रहा।
लेकिन भारतीय मानवविज्ञानी टीएन पंडित ने सेंटिनलीज़ को एक अलग दृष्टिकोण से दर्शाया है।दशकों की अवधि में अलग अलग द्वीप समुदाय का दौरा करने वाले मानवविज्ञानी टीएन पंडित जी ने अपने अनुभव से कहते हैं कि सेंटिनलीज़ काफी हदतक "शान्ति प्रिय" है।टीएन पंडित जी ने सन् 1967 में पहलीबार इन सेंटिनलीज़ के साथ सम्पर्क स्थापित करने के उद्देश्य से उत्तरी सेंटिनल द्वीप का दौरा किया था। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। प्रारंभ में सेंटिनलीज़ बाहरी लोगों को देखते ही जंगल में छिपते थे। लेकिन बाद में तीरों से हमला करना शुरू कर दिया था।
संपर्क स्थापित करने की कोशिश करने वाले कई अभियानों के बाद, उन्हें पहली वास्तविक सफलता 1991 में मिली जब जनजाति शांतिपूर्वक समुद्र में उनसे संपर्क करने के लिए निकली।पंडित जी ने सेंटिनलीज़ को आकर्षित करने के लिए अपने साथ चुनिंदा वस्तुएँ लेकर गये थे।द्वीप पहूचते ही उन्होंने नाव से बाहर कूद गए और गर्दन तक पानी में खड़े होकर नारियल और अन्य उपहार बाटने लगे। लेकिन सेंटिनलीज़ उन्हें द्वीप पर कदम रखने की अनुमति नहीं दिया था। उनका कहना है कि उनकी टीम के सदस्यों ने सेंटिनलीज़ के साथ सांकेतिक भाषा में संवाद करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली क्योंकि वे बड़े पैमाने पर अपने उपहारों में व्यस्त थे।
श्री पंडित जी का कहना है कि "वे आपस में बात कर रहे थे लेकिन हम उनकी भाषा समझ नहीं सके। यह क्षेत्र के अन्य आदिवासी समूहों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के समान लग रही थी।"
यात्रा के दौरान एक यादगार तनावपूर्ण बातचीत में, जनजाति के एक युवा सदस्य ने उसे धमकी दी।उन्होंने बताया, "जब मैं नारियल बांट रहा था तो मैं अपनी टीम के बाकी सदस्यों से थोड़ा अलग हो गया और किनारे के करीब जाने लगा।एक युवा सेंटिनल लड़के ने मजाकिया चेहरा बनाया, अपना चाकू लिया और मुझे संकेत दिया कि वह मेरा सिर काट देगा। मैंने तुरंत नाव बुलाई और तुरंत पीछे हट गया।"तब से भारत सरकार ने उपहार देने के अभियानों को बंद कर दिया है, और बाहरी लोगों के द्वीप के पास जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
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